श्रुत आराधक : श्रावक – श्राविका ज्ञानवान बने , क्रियावान बने तथा ज्ञान ध्यान में उनकी अभिरुचि बढ़े , इस उद्देश्य को लेकर ‘ श्रुत आराधक ‘ पाठ्यक्रम रचा गया है । सन 2020 तक , जो पूज्य आचार्य स्व. श्री नानालालजी म.सा. की जन्म शताब्दी वर्ष ( Centenary Year ) के रूप में मनाया जाएगा , उत्तम ज्ञान वाले श्रावक वर्ग तैयार करने का लक्ष्य है ।

परिवारांलि : जन्म शताब्दी वर्ष के ही परिप्रेक्ष्य में पंच सहस्त्री श्रधाभिशिक्त परिवारांजलि नामक महायज्ञ आयाम स्वरुप गुरु भगवन द्वारा प्रदत्त हुआ है । जिसके अंतर्गत साधुमार्गी परिवारों को व्रत ग्रहण आह्रानित है ।

आगम भक्ति :  संघ के प्रत्येक श्रावक – श्राविका से अपेक्षित है कि वे आगम के विभिन्न पहलुओं की जानकारी प्राप्त करें । सूत्रों गाथाओं का स्वाध्याय करें तथा प्रमुख थोकड़े आदि कंठस्त करें ।

उक्रांति : जैन धर्म का उदभव समाज में व्याप्त , हिंसा , अनाचार , प्रदर्शन , पाखण्ड और कर्म काण्ड के निवारण हेतु एक उत्क्रांति के रूप में हुआ था । तथापि समय के प्रहार से और संसर्ग दोषों से , श्रेष्ठ , जैन समाज में भी कतिपय सामाजिक कुरीतियों का समावेश हुआ । दहेज़ , वैभव , प्रदर्शन , तपस्या में भी आडम्बर , शादी विवाह पर फिजूलखर्ची , भोंडे प्रदर्शनी आदि कुरीतियों से जैन समाज अछूता नहीं रहा । इसे समय में चर्तुविध संघ के नवम नक्षत्र पूज्य आचार्य श्री रामलालजी म.सा. ने इन कुरीतियों के उन्मूलन हेतु ” उत्क्रांति एक संकल्प ” के रूप में आज से डो वर्ष पूर्व बैंगलोर चातुर्मास में संघ पर महती कृपा करते हुए एक आयाम प्रदान किया ।