संघ की विविध प्रवृत्तियों की विस्तृत जानकारी

धार्मिक प्रवृत्तियाँ-

समता संस्कार पाठशाला : यह संघ का प्रमुख प्रकल्प (Flagship Project ) माना जाता है ।  सुसंस्कारित बालकवृंद समजोत्थान की आधारशिला है । बच्चो में संस्कार निर्माण के उद्धेश्य से देशभर में विभिन्न केन्द्रों पर दैनिक व साप्ताहिक पाठशालाएं संचालित की जा रही हैं । 200 पाठशालाओं में 5382 अध्ययनरत बालक – बालिकाओं के हितार्थ 334 शिक्षिकाएं अपनी सेवाएँ प्रदान कर रही हैं । शिक्षार्थिओं दकस तत्वज्ञान से भी परिचित कराया जाता है ; वे संघ द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित धार्मिक परीक्षाओं में भी भाग लेते हैं । पाठशाला उपक्रम को विस्तृत व विकसित करने की दृष्टी से एक अभिनव परियोजना – ” Know & Grow ” संकल्पित हुई है । जैन तत्वों की सिख देने हेतु यह एक पुस्तक स्वरुप सुरुचिपूर्ण व सुबोधगम्य पठनसामग्री है  । समता प्रचार संघ : इस प्रवृति का उद्भव समता विभूति परम श्रद्धेय स्व. आचार्य प्रवर श्री नानालालजी म. सा. की सद्प्रेरणा से उदयपुर में सन् 1978 में हुआ। प्रवृति का उद्देश्य समता सिद्धांत दकस जन – जन तक पहुँचाने का रहा है । स्वाध्यायियों को तैयार करने के लिए समय – समय पर स्वाध्यायी प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करना , पयुर्षण पर्वाराधन के पावन प्रसंग पर अधिकाधिक क्षेत्रों में धर्माराधना कराना इस प्रवृति के मुख्य कार्य हैं । वर्तमान में प्रतिवर्ष लगभग 500 स्वाध्यायी समता प्रचार संघ के माध्यम से लगभग 200 स्थलों पर स्वाध्यायी सेवा देते हैं । समता संस्कार शिविर : संघ द्वारा बालक – बालिकाओं के चरित्र निर्माण हेतु प्रतिवर्ष सम्पूर्ण देश में क्षेत्रीय एवं स्थानीय समता संस्कार शिविरों का आयोजन किया जाता है । इन शिविरों के माध्यम से बालक – बालिकाओं दकस जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान कराया जाता है साथ ही उन्हें व्यसनमुक्त एवं संस्कारयुक्त जीवन जीने की विशेष प्रेरणा दी जाती है । प्रतिवर्ष लगभग 8 से 10 हजार बालक – बालिकाएं समता संस्कार शिविरों में भाग लेते हैं ।

शैक्षणिक प्रवृत्तियाँ-

धार्मिक परीक्षा बोर्ड : इसका प्रमुख उद्देश्य मुमुक्षु आत्माओं व चरित्रत्माओं में सम्यक ज्ञान की अभिवृद्धि करना है । इस परीक्षा में प्रतिवर्ष लगभग 200 मुमुक्षु एवं चरित्रात्माएँ भाग लेती हैं । इसमें सिद्धांत भूषण , कोविद , विशारद , शास्त्री , प्रभाकर आदि अनेक पाठ्यक्रमों का संचालन किया जाता है । जैन संस्कार पाठ्यक्रम : बालक – बालिकाओं , युवक – युवतियों एवं श्रावक – श्राविकाओं दकस जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान देते हुए उत्तरोत्तर आगम एवं तत्व ज्ञान से परिचित करने के लक्ष्य से संघ द्वारा जैन संस्कार पाठ्यक्रम परीक्षा का आयोजन विगत कई वर्षो से किया जा रहा है । संघ द्वारा इन परीक्षाओं हेतु जैन संस्कार पाठ्यक्रम पुस्तिकाएँ भाग – 1 से 12 तक प्रकाशित की जा चुकी हैं । प्रतिवर्ष लगभग 275 परीक्षा केन्द्रों पर 5000 से अधिक परीक्षार्थी भाग लेकर जैन धर्म एवं दर्शन का ज्ञान प्राप्त करते हैं । समता बुक बैंक : महाविद्यालय स्तरीय एवं उच्च तकनीकी शिक्षा ग्रहण करने वाले जैन छात्रों को पाठ्य पुस्तकें सहज उपलब्ध कराने हेतु समता बुक बैंक , उदयपुर की स्थापना की गई है । समता बुक बैंक से कला , वाणिज्य , विज्ञान , सी. ए. , सी. एस. , एम.बी.ए. , एमबीबीएस , आई.टी. एवं इसी प्रकार के अन्य उच्च स्तरीय पाठ्यक्रम हेतु पुस्तकें उपलब्ध कराई जाती हैं । प्रतिवर्ष लगभग 300 छात्र इस बुक बैंक से लाभान्वित होते हैं । वर्तमान में पुस्तकालय में 1520 पुसतकें है । आगम , अहिंसा – समता एवं प्राकृत संस्थान , उदयपुर : जैन विद्या अध्ययन के विकास के परिप्रेक्ष्य में यह एक प्रमुख प्रवृति है । प्राकृत एवं जैन धर्म व संस्कृति विषयक संगोष्ठियों का आयोजन , शोधलेखों का प्रकाशन , तथा ग्रंथो का अनुवाद व प्रकाशन , संस्थान के सेवा कार्यो का विशिष्ट आयाम है । संस्थान का एक वृहत पुस्तकालय है जिसमें जैन बौद्ध तथा वैदिक परंपरा से संदर्भित 8952 पुस्तकें एवं 1556 हस्तलिखित पांडुलिपियां संग्रहित हैं । संस्थान द्वारा प्राकृत व्याकरण , 3 शोध ग्रंथो एवं 10 प्रकीर्णक ग्रंथो का प्रकाशन किया जा चूका है । इनके अतिरिक्त मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के जैन विद्या एवं प्राकृत विभाग द्वारा स्वीकृत व निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें भी संस्थान द्वारा प्रकाशित हुई हैं । स्वाध्यायी गुणवत्ता विकास कार्यक्रम : संघनिष्ठ श्रावक – श्राविकाओं , स्वाध्यायियों एवं मुमुक्षुओं को घर बैठे पत्राचार पद्धति से जैन धर्म , दर्शन , इतिहास , आगम सम्मत धारणाओं एवं थोकड़ो का मौलिक ज्ञान कराने के उद्देश्य से संघ द्वारा वर्ष 2008 में स्वाध्यायी गुणवत्ता विकास कार्यक्रम प्रारंभ किया गया । इस त्रि – वर्षीय पत्राचार पाठ्यक्रम के प्रत्येक सत्र में लगभग 400 परीक्षार्थी भाग लेते हैं । श्री गणेश जैन छात्रावास : इसकी संस्थापना शांतक्रांति के अग्रदूत स्व. आचार्य श्री गणेशलाल जी म.सा. की पुण्यस्मर्ति में 01 अगस्त 1964 को हुई थी । छात्रावास का प्रयोजन केवल आवासीय व भोजन सुविधा उपलब्ध कराना नहीं था , अपितु जैन समाज के छात्रों को सुसंस्कारित , धर्मानुरागी व व्यावहारिक दृष्टि से समुन्नत बनाना भी था । अब तक हजारों छात्र इसकी सुविधाओं से लाभान्वित हो चुके हैं ; उनके चरित्र निर्माण में भी एम.बी.ए. , बी.कॉम. इत्यादि संव्यावसायिक ( Professional )  कोर्स के विद्यार्थियों की क्षमता – युक्त नविन , आधुनिक , भोजनशाला का निर्माण हुआ हैं । विद्वत् निर्माण प्रकल्प : यह योजना संघ द्वारा वर्ष 2009 में प्रारंभ की गई है द्व यहाँ बालकों को व्यावहारिक शिक्षा के साथ ही धार्मिक शिक्षा दी जाती है । तत्पश्चात विशेष रूप से चयनित छात्र को संस्कृत एवं प्राकृत भाषा का प्रारंभिक अध्ययन करवाया जाता है । इस प्रकल्प में 50 छात्रों के लिए आवासीय सुविधा उपलब्ध है । श्री गणेश ज्ञान भंडार , रतलाम : यह अप्रतिम ज्ञान भण्डार लगभग 750000 से अधिक पुस्तकों व दुर्लभ ग्रंथो से सुसज्जित है । अनेक हस्तलिखित पांडुलिपियां भी यहां संग्रहित हैं । इस केंद्र से चारित्रात्माओं , मुमुक्षुओं व स्वाध्यायियों के ज्ञानार्जन हेतु पठन – सामग्री उपलब्ध कराने का गुरुतर कार्य संपन्न होता है । भण्डार में संग्रहित व संरक्षित सभी पुस्तकों का कम्प्यूटरीकरण हो चूका है , जिसके चलते पुस्तकों के वितरण व व्यवस्थापन का कार्य सुगम व सुनियोजित हुआ है । भण्डार का संचयन जैन समाज की अनमोल धरोहर है । इस प्रवृति की प्रगति , स्वाध्याय व जैन विद्या में रूचि उजागर करने के पुनीत प्रयासों में संघ के योगदान की गौरवगाथा है । पूज्य आचार्य श्री श्रीलाल उच्च शिक्षा योजना : आचार्य श्री की पावन प्रेरणा से परिकल्पित एवं आपश्री की स्मृति को समर्पित यह उच्च शिक्षा योजना स्वधर्मी मेधावी व महत्वाकांक्षी विद्यार्थियों हेतु विशेषकर जो धनाभाव के कारन उच्च शैक्षणिक सुविधाओं व अवसरों से वंचित रह जाते हैं , एक वरदान स्वरुप है । इस योजना के अंतर्गत जो अब संघ की अभिनव प्रवृति के रूप में आरम्भ की गई है , स्थानक / स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए प्रतिभावान विद्यार्थिओं को ब्याज – मुक्त अर्थ सहयोग उपलब्ध कराया जाता है । स्वदेश एवं विदेश के मान्यता प्राप्त शिक्षण केन्द्रों में प्रवेश – प्राप्ति के पश्चात् यथोचित अर्थ सहयोग प्रदत होता है । योजना के कार्यान्वयन व संचालन हेतु एक प्रबंधन समिति गठित हुई है ।

साहित्यिक प्रवृत्तियाँ-

श्रमणोपासक : यह हिंदी पाक्षिक संघ का मुखपत्र व प्रतिनिधिक विचार वाहिनी है जो संघ स्थापना के समकालीन विगत 54 वर्षो से अविरल प्रकाशित हो रहा है । पत्रिका में आचार्य भगवंतो के दिव्य प्रवचन व अमृतवाणी , जैन धर्म व दर्शन संदर्भित लेखन , संघ संबंधी सूचना , तथा अन्य नैतिक , मूल्य – आधारित , उत्प्ररेक व प्रेरणास्पद स्तम्भ प्रस्तुतियों की समाविष्टि होती है । अपने रुचिपूर्ण चित्तरंजन विषय – वस्तु के कारण ‘ श्रमणोपासक ‘ जनप्रिय तो है ही , साथ ही विवेकपूर्ण पाठक इसे समाज में जागृति व परिवर्तन के उद्दीपक के स्वरुप में आंकते हैं । वर्तमान में ‘ श्रमणोपासक ‘ के 18000 से अधिक आजीवन अभिदाता सदस्य हैं । साधुमार्गी पब्लिकेशन : संघ द्वारा जैन धर्म , दर्शन , आगम , कथा एवं प्रवचन से संदर्भित साहित्य का प्रकाशन किया जाता है । सत्साहिक का प्रकाशन संघ की महत्वपूर्ण प्रवृति है । आगम , अहिंसा – समता एवं प्राकृत संस्थान : जैन आगमों में निरुपित तत्व ज्ञान को कंठस्थ करने तथा उन पर चिंतन , मनन , अन्वेषण करने से शास्त्रों के गहन विषयों का भी सरलता से ज्ञान प्राप्त हो जाता है । तत्व प्रकाशन समिति द्वारा तत्व ज्ञान संबंधी 20 पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है ।

सामाजिक / चिकित्सा एवं आरोग्य प्रवृतियाँ

समता जनकल्याण प्रन्यास : ऐसे स्वधर्मी भाई बहनों को , जो असाध्य बीमारी से ग्रसित हों परन्तु चिकित्सा व्यय वहन करने में असमर्थन हों समता जन कल्याण प्रन्यास द्वारा चिकित्सा हेतु अर्थ सहयोग प्रदान किया जाता है । भगवान महावीर समता चिकित्सालयडोंडीलोहारा  : छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में इस चिकित्सालय की स्थापना वर्ष 1999 में हुई । वर्तमान में यह चिकित्सालय वर्मन मशीन , एक्स – रे सुविधा , पैथोलोजी लेब , प्रसूति गृह एवं ऑपरेशन थियेटर आदि से सुसज्जित है । चिकित्सालय परिसर में भोजनालय एवं जल – मंदिर का संचालन भी किया जा रहा है । हजारों व्यक्ति इस चिकित्सालय से लाभान्वित हो चुके हैं । नेत्र चिकित्सा शिविर : संघ द्वारा प्रतिवर्ष आचार्य भगवन के चातुर्मास प्रवास के दौरान वृहद नेत्र चिकित्सा शिविर का आयोजन किया जाता है । हजारों नेत्र रोग पीड़ितों का उपचार इस प्रकार के शिविरों में किया जा चुका है । धर्मपाल – सिरिवाल प्रवृति : समता विभूति आचार्य श्री नानालालजी म.सा. ने मालवा प्रान्त में विचरण करते हुए देखा की वहां की बलाई जाती के लोग कुरीतियों से घिरे हुए थे एवं अनेक दुर्व्यसनों से ग्रसित थे । ऐसे लोगों को आचार्य भगवन ने शाकाहार , व्यसनमुक्ति एवं सुसंस्कार अपनाने हेतु विशेष उद्बोधन दिया । जिससे प्रभावित होकर मालवा क्षेत्र के सैंकड़ो गाँवो के लाखो लोगो ने व्यसनमुक्त जीवन जीने का संकल्प लिया । इन्हें आचार्य भगवन ने धर्मपाल के नाम से संबोधित किया । आचार्य श्री नानेश द्वारा उद्घोषित धर्मपाल प्रवृति के सामानांतर वर्तमान आचार्य प्रवर श्री रमेश ने राजस्थान के मेवाड़ प्रान्त की जनजाति बावरी समाज के व्यक्तियों को , जो हिंसक गतिविधिओं में लिप्त थे , कुव्यसनों को छोड़कर संस्कारित जीवन जीने की प्रेरणा दी । आचार्य भगवन ने इन्हें सिरिवाल नाम से संबोधित किया । नानेश निकेतन रतलाम द्वारा धर्मपाल – सिरीवाल प्रवृति का सुचारू संचालन हो रहा है । लोगों को संस्कारित जीवत जीने की प्रेरणा देने हेतु बहुआयामी कार्य किये जा रहे हैं । नानेश चिकित्सालय , रतलाम : संघ के चिकित्सा एवं आरोग्य प्रवृतियों की श्रंखला में नानेश चिकित्सालय रतलाम एक अभिनव कड़ी है । धर्मपाल बंधुओं एवं अन्य जनों के सेवार्थ तथा उपचारार्थ नानेश निकेतन परिसर रतलाम में नानेश चिकित्सालय का शुभारम्भ 10 जनवरी 2016 को किया गया । चिकित्सालय में अन्य आवश्यक सुविधाएँ जैसे ईसीजी (ECG) , रुग्णवाहिनी (Ambulance) इत्यादि उपलब्ध करवाने हेतु संघ प्रयासरत है । यह सेवा प्रकल्प तात्कालिक सफलता (Instant Success) व जनप्रियता हासिल कर चूका है । उपचार के साथ साथ नि : शुल्क औषध की भी सेवा मरीजों को उपलब्ध कराई जाती है ।

संघ समृद्धि योजनाएँ-

दानपेटी योजना : संघ की समस्त प्रवृत्तियों में लोगों की सहभागिता सुलभ हो इस हेतु संघ द्वारा दानपेटी योजना का शुभाराम्भ किया गया । संघनिष्ठ परिवारों ने दानपेटी अपने यहाँ लगा राखी है जिसमें वो प्रतिदिन अपना अंशदान संघ विकास के लिए देते हैं । संघ सदस्यता अभियान : संघ प्रभावक एवं शिखर सदस्यता अभियान के साथ ही संघ के आजीवन सदस्य , साहित्य सदस्य एवं  श्रमणोपासक सदस्य आदि में उत्तरोत्तर अभीवृद्धि हो रही है । इदं न मम् (यह मेरा नहीं हैं): श्री अ.भ.सा. जैन संघ की विभिन्न प्रवृत्तियों के सुचारू सञ्चालन हेतु एक अभिनव प्रतिबद्धता की मिसाल एवं अर्थ सौजन्य का माध्यम प्रस्तावित हुआ है । दानदाताओं ने अपनी आय का निर्धारित भाग आजीवन नियमित रूप से संघ को समर्पित करने का संकल्प लिया है । इस समर्पण भाव की अभिव्यक्ति को ” इदं न मम् ” (यह मेरा नहीं हैं) के रूप में साकार किया गया है ।

विशिष्ट प्रवृत्तियाँ-

वीर सेवा समिति : वीर सेवा समिति का मुख्य लक्ष्य हैं कि वीर परिवार की सेवा , सुश्रुषा में संघ अपने दायित्व का निर्वहन करे । इस हेतु बिना ब्याज के ऋण सहायता भी दी जाती है । विहार सेवा समिति : चरित्रत्माओं के शेखेकाल विहार के समय संघ का विशेष दायित्व बनता है की उनकी विहार यात्रा में संघ सध्वोचित मर्यादा का पालन करते हुए सहयोगी बने । इस भावना को ध्यान में रखते हुए अपरिचित एवं दूरस्थ क्षेत्रों में विचरणरत चरित्रत्माओं के साथ जो विहार्कर्मी होते हैं उनकी सेवा , सुश्रुषा का दायित्व केन्द्रीय संघ वहां करता है । स्वधर्मी सहयोग : श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन महिला समिति द्वारा संचालित इस प्रवृति के अंतर्गत जरुरतमंद स्वधर्मी परिवारों को प्रतिमाह आवश्यक सहायता प्रदान की जा रही है । छात्रवृति योजना : श्री अ.भ. साधुमार्गी जैन महिला समिति द्वारा 12 वीं कक्षा तक के विद्यार्थिओं को छात्रवृति प्रदान की जाती है । व्यसनमुक्ति एवं संस्कार जागरण : आचार्य श्री रामेश का प्रमुख सन्देश व्यसनमुक्ति आज के इस आधुनिक युग में अत्यंत प्रासंगिक है । अब तक इस कार्यक्रम में विद्यालयों , महाविद्यालयों , काराग्रहों एवं सार्वजानिक स्थलों पर भाषण , व्याख्यानमाला , प्रदर्शनी एवं रैलियों के माध्यम से लोगों को कुव्यसन त्यागने की उत्प्रेरणा देकर उन्हें व्यसनमुक्त करने का कार्य अनवरत किया जा रहा है । सेठ घेवरचंद केसरीचंद गोलछा जवाहर स्मृति व्याख्यानमाला निधि : इस व्याख्यानमाला का उद्देश्य जैन धर्म , दर्शन एवं संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में विद्वानों के चिंतन को जैन एवं जैनेतर वर्ग तक पहुँचाना है । अब तक संघ द्वारा 13 व्याख्यानमालाओं का आयोजन किया जा चूका है जिनमें लब्धप्रतिष्टित विद्वानों के भाषण हुए । साधुमार्गी प्रतिभा खोज कार्यक्रम : साधुमार्गी जैन संघ के देशव्यापी परिवारों में परस्पर संपर्क किया जा सके , उनके बालक – बालिकाओं की शिक्षा एवं प्रतिभा से सभी अवगत हो सकें , इन सब उदेश्यों हेतु समता युवा संघ के माध्यम से साधुमार्गी प्रतिभा खोज कार्यक्रम अनवरत जारी है । श्रमणोपासक अभिनन्दन संग्रह : श्रमणोपासक अभिनन्दन संग्रह नामक संकलन प्रस्तावित है जो एक संग्राहिक / चित्रावली (एलबम ) के स्वरुप में होगा जिसमे भारत में व विदेश में निवासरत सभी साधुमार्गी परिवारों के सदस्यों के छायाचित्र (फोटो )  अंतरविष्ट होंगे । समता भवन निर्माण : श्रावक – श्राविकाएं धर्माराधना हेतु गाँव / नगर में समता भवनों का निर्माण करवाते है । सम्पूर्ण देश में कई स्थलों पर समता भवन निर्मित है जहाँ नियमित धर्माराधना होती है तथा संयमी मर्यादा के अनुरूप चरित्रत्माओं का चातुर्मास एवं शेखेकाल में वहां बिराजना होता है ।

संघ की सहयोगी शाखाएँ-

श्री अ. भा. साधुमार्गी जैन महिला समिति, बीकानेरः- नारी वर्ग ममता, करूणा, वात्सल्य का प्रतिबिम्ब है। अगर किसी भी समाज की नारी सुसंस्कारित, शिक्षित एवं सभ्य होगी तो वह समाज किसी भी दृष्टि से पीछे नहीं रहेगा। उसी उद्देश्य को लेकर महिलाओं के संगठन की स्थापना श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन महिला समिति के रूप में की गई। अपने स्थापना से लेकर अब तक महिला समिति की देशभर में फैली सैकडों शाखाओं ने स्वधर्मी सहयोग, छात्रवृत्ति, जीवदया, धार्मिक क्रियाकलाप आदि में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। महिला समिति का केन्द्रीय कार्यालय समता भवन बीकानेर में स्थित है तथा वर्तमान में महिला समिति स्वधर्मी सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रही है। इस वर्ष देशभर में समीक्षण ध्यान शिविरों का आयोजन महिला समिति का मुख्य लक्ष्य है। श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन समता युवा संघ, रतलामः- आचार्य श्री नानेश के अजमेर चातुर्मास में युवाओं को नई दिशा, नई सोच देने के लिये तथा उन्हें धर्म, समाज से जोडने के लिये श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन समता युवा संघ की स्थापना की गई। अल्पकाल में ही युवाओं के इस संगठन ने संघ में विशिष्ट पहचान बनाई तथा इसके हजारों कार्यकर्ताओं ने देश के कोने-कोने में पूज्य गुरूदेव के दिव्य संदेश, व्यसनमुक्ति, संस्कार क्राति का शंखनाद कर एक नवीन क्रांति उत्पन्न कर दी। वर्तमान में इसका केन्द्रीय कार्यालय रतलाम (म.प्र.) मे स्थित है तथा वहीं से समता युवा संघ के मुखपत्र समता युवा संदेश का प्रकाशन हो रहा है। रक्तदान, फल वितरण, स्वास्थ्य शिविर, युवा दिशा बोध शिविर , युवा प्रबोध शिविर, व्यसनमुक्ति आदि अनेक ऐसे धार्मिक एवं सामाजिक कार्य है जो युवा संघ द्वारा संचालित किये जा रहे है। अनुरोधः- श्री अ.भा. साधुमार्गी जैन संघ अपनी विविध गतिविधियों को प्रभावी रूप से कार्य रूप में परिणित कर रहा है। संघ के उदारमना, दानीमानी महानुभावों के सहयोग से श्रम साध्य और अर्थ साध्य विविध प्रवृत्तियां सुचारू रूपेण संचालित हो रही है। यह प्रवृत्तियां सुचारू रूप से गतिमान रहे और ऐसी ही अन्यायन्य सत प्रवृत्तियां हम और अधिक संचालित कर सके तथा समाज में निर्धन एवं जरूरतमंद लोगों को सहायता पहुंच सके तथा स्वयं अपना परिजनों का, समाज एवं राष्ट्र का नैतिक एवं सांस्कृतिक उत्थान करने में सहयोगी बन सके। इस हेतु हम सब को संघ की विविध गतिविधियों में अपनी ईच्छा शक्ति और क्षमता से अधिक सहयोग कर संघ को आगे बढाने में सहभागी बनना है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति पर हित को सर्वोपरि मानकर कार्य करता है वह सर्वत्र आदरणीय एवं सम्मानीय होता है। भगवान् महावीर से गौतम की यह जिज्ञासा प्रेरणादायी है जब गौतम महावीर से पूछते है कि आपकी पूजा और उपासना करने वाला धन्य है अथवा दीन दुखियों की सेवा करने वाला धन्य है। उत्तर में भगवान् महावीर कहते है कि ’’जै गिल्लाणं परिहरइ से धन्ने‘‘ अर्थात जो दीन-दुखियों की सेवा करें वो धन्य है। आइये ! हम भी भगवान महावीर की इस प्रेरणा को शिरोधार्य कर संघ, समाज एवं राष्ट्र के लिये अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाये।

सहयोग की अपेक्षा सहित जय नानेश जय रामेश !