समता विभूति आचार्यश्री नानेश ने अपने 1981 उदयपुर के वर्षावास में सम्यकज्ञान की अभिवृद्धि हेतु प्रभावशाली उद्बोधन दिया जिसका श्रोताओं पर व्यापक प्रभाव पडा। फलतः विश्वविद्यालयों के विद्वानों तथा उदयपुर श्रीसंघ ने जैन विद्या के अध्ययन के विकास हेतु एक योजना तैयार की। जिसके फलश्रुति के रूप में आगम अहिंसा-समता एवं प्राकृत संस्थान की स्थापना हुई। संस्थान की प्रमुख प्रवृतियों में प्राकृत एवं जैन विद्या विषयक संगोष्ठियों का आयोजन एवं संगोष्ठियों में पठित शोद्यालेखों का प्रकाशन, प्राकृत एवं जैन विद्या विषयक व्याख्यानों का आयोजन, महत्वपूर्ण ग्रंथों का अनुवाद संपादन एवं प्रकाशन, प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपियों का संग्रहण एवं संरक्षण, प्राचीन एवं आधुनतन ग्रंथों के समृद्ध पुस्तकालय का संचालन, चयनित शोद्य प्रबंधनों का प्रकाशन रहा है। संस्था द्वारा अभी तक 32 पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है जिसे विद्वत जगत् ने मुक्त कंठ से सहारा है। संस्थान के समृद्ध पुस्तकालय में जैन, बौद्ध एवं वैदिक संस्कृति संबधित प्राचीन एवं आधुनिक लगभग 5,000 पुस्तकों का संग्रह संग्रहित है। संस्थान के संग्रहण कोष में 1500 प्राचीन हस्तलिखित पाण्डुलिपियां जो कि विक्रम संवत् 1600 से 1900 के मध्य की है, व्यवस्थित रूप से संग्रहित है।